Monday, August 12, 2013

बारिश है कि रुकने का नाम नहीं ले रही
ये सीलन अब भीतर तक उतर आई है 
जहाँ छू के देखती हूँ कुछ उखड के आ जाता है 
नहीं अब और नहीं 
नहीं सह पायेगी ये दीवार
हर बार यूँ ही तूफानों के थपेड़े सह सह के 
दरक चुका सब  भीतर भीतर 

आखिर कब तक उम्मीदें  जिन्दा रहेंगी 
टूट कर बिखरा हुआ तो जुड़ भी जाता 
ढह चुका कोई कैसे थामे 

बस रिसता ही  जा रहा 
रिसता ही जा रहा 
बहा ले गया अबकी ये सैलाब सब कुछ 

baadlon ki athkheliyan

बादलों की अठखेलियाँ 

कुछ दिन पहले मांडू जाना हुआ। एक लम्बे वक़्त के बाद खुद के साथ कुछ वक़्त मिला और उन्ही पलों में चुपके से बादल भी आसमां  से उतर आये… 
याद दिलाने आये थे ,कितना कुछ छूटता  जा रहा है। अब भी थाम लो अगर थाम सको.…