बारिश है कि रुकने का नाम नहीं ले रही
ये सीलन अब भीतर तक उतर आई है
जहाँ छू के देखती हूँ कुछ उखड के आ जाता है
नहीं अब और नहीं
नहीं सह पायेगी ये दीवार
हर बार यूँ ही तूफानों के थपेड़े सह सह के
दरक चुका सब भीतर भीतर
आखिर कब तक उम्मीदें जिन्दा रहेंगी
टूट कर बिखरा हुआ तो जुड़ भी जाता
ढह चुका कोई कैसे थामे
बस रिसता ही जा रहा
रिसता ही जा रहा
बहा ले गया अबकी ये सैलाब सब कुछ
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